315 पन्नों की रपट में कुछ पन्ने सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही है। एक खबर के अनुसार न्यायालय ने 21 पैराग्राफ़ गुप्त रखने की बात कही है, मगर सरकार ने 128 पैराग्राफ़ नहीं दिखाए है।
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
केरल की फ़िल्मों ने भारतीय फ़िल्मों को एक नई ऊंचाइयां दी है। हिन्दी फ़िल्म उद्योग को उसने चुनौती दी है। सबटाइटिल्स और डबिंग की सहूलियत के चलते आज देश-विदेश की अन्य भाषाओं का सिनेमा काफ़ी हद तक आसान हुआ है। केरल के सिनेमा की थीम, कलाकारों की अभिमय कुशलता, कैमरावर्क, संगीत की सब ओर जमकर प्रशंसा हो रही है। मगर इस महीने के प्रारंभ में हेमा कमीशन के खुलासे ने केरल फ़िल्म उद्योग की चूलें हिला दी हैं। वहां पिछले दो सप्ताह से मीडिया और जनता की जबान पर इस रिपोर्ट के अलावा कोई और बात नहीं है। मीडिया भले ही बढ़-चढ़ कर चीख रहा हो, पर भीतर का सच अभी पूरी तरह आना है। कभी पूरा आएगा, इसमें शक है।
युवाओं की महत्वाकांक्षाओं का रसूख वाले लोग अपनी हवस पूर्ति के लिए दुरुपयोग करते हैं। किसी मजबूरी में समझौता करने वाले को भी सबसे पहले अपनी आत्मा गिरवी रखनी होती है। असल में सत्ताधारियों के कच्चे चिट्ठे की यह हेमा कमीशन रिपोर्ट साढ़े चार साल पहले यानी 2019 में आ गई थी।
अब आरटीआई के तहत केरल फ़िल्म इंडस्ट्री में इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से पैंडोरा बॉक्स खुला है। पर क्या पूरा खुला है? नहीं, पूरा बॉक्स नहीं खुला है। हर क्षेत्र के सत्ताधारी बहुत शक्तिशाली होते हैं, चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो अथवा फ़िल्म या कोई अन्य विभाग क्यों न हो। कारण, अगर पूरी रिपोर्ट का खुलासा हो गया तो, कई लोगों की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाएगी।
दरअसल, 315 पन्नों की रपट में कुछ पन्ने सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही है। एक खबर के अनुसार न्यायालय ने 21 पैराग्राफ़ गुप्त रखने की बात कही है, मगर सरकार ने 128 पैराग्राफ़ नहीं दिखाए है। इस रिपोर्ट में मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में स्त्रियों से जुड़े यौन शोषण-अत्याचार तथा लिंग असामनता की बात विस्तार से आई है। रिपोर्ट के मुताबिक इन आरोपियों में कई सिने तथा कई सरकारी उच्च पदासीन शामिल हैं। बाकी के पन्ने भी सार्वजनिक करने की लड़ाई जारी है।
मलयालम सिनेमा की दुनिया और उत्तर भारत
उत्तर भारत खासकर हिन्दी जनता को मलयालम सिनेमा और इसके कार्य प्रणाली की जानकारी नहीं के बराबर है। पर जो लोग इसके विषय में जानते हैं, इसे मुख्य रूप से अम्मा (एसोशिएसन ऑफ़ मलयालम मूवी आर्टिस्ट, AMMA) संस्था चलाती है। यह संस्था पूरी तरह पुरुषसत्तावादी है। इससे असहमत होने वाले की खैर नहीं, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष। दस शक्तिशाली अभिनेताओं के समूह की गिरफ़्त में पूरा मलयालम सिने-जगत था। वरिष्ठ अतिकुशल अभिनेता तिलकन इसका एक उदाहरण रहे हैं। कहा जाता है कि आरोपी अभिनेता दिलीप होने को तो अम्मा का एक सामान्य सदस्य था, मगर उसकी खूब चलती थी।
एक रिपोर्ट के अनुसार-
दिलीप ने एक अन्य स्त्री कलाकार का अपहरण कर उसका कार में बलात्कार करवाया था। कारण था एक अन्य स्त्री से सम्पर्क की बात इस बलत्कृता स्त्री ने दिलीप की पत्नी को बता दी थी। केस दर्ज होने पर दिलीप को सजा हुई, मगर वह कुछ महीनों में जेल से बाहर आ गया। मुकदमा चल रहा है। ‘अम्मा’ ने सजा के दौरान दिलीप की सदस्यता समाप्त कर दी थी, मगर जमानत पर छूटते ही उसे पुन: सदस्यता दे दी। सब लोग उस स्त्री का नाम जानते हैं, मगर बलत्कृता का नाम लेना न्याय विरुद्ध है। जो नियम नहीं जानते हैं, वे उसका नाम लेने की अनजाने में भूल करते हैं। केरल ने उन्हें ‘अतिजीविता’ नाम से अभिसिक्त किया हुआ है। क्योंकि खुद उनके अनुसार वे विक्टिम नहीं सर्वाइवर हैं।
इसी संदर्भ में मलयालम फ़िल्म उद्योग की कुछ स्त्रियां उठ खड़ी हुईं और उन्होंने स्त्रियों के प्रति होते अन्याय, रोकने केलिए, ‘अम्मा’ को चुनौती देती हुई इन कुछ स्त्री कलाकारों, पार्वती तिरुवोतु, अंजलि मेनन, रीमा कल्लिंगल, मंजु वारियर आदि ने मिल कर 2017 में ‘वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव’ (WCC) की स्थापना की।
मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में लिंग समानता तथा सुरक्षा एवं यौनिक अत्याचार से बचाव के लिए यह संस्था प्रतिबद्ध है। डब्ल्यूसीसी के अथक परिश्रम फ़लस्वरूप केरल सरकार ने मलयालम सिने-जगत में स्त्रियों की समस्याओं का अध्ययन करने केलिए जस्टिस हेमा की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। समिति ने कई लोगों की गवाही के बाद 2019 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी। रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद से डब्ल्यूसीसी संस्था स्त्रियों केलिए न्याय पाने केलिए फ़िर खूब से सक्रिय है।
