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रूढ़िवादी मुस्लिमों में खतना के बाद महिलाओं को ‘शुद्ध’ माना जाता हैखतना कराने से महिलाओं में प्रजनन संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैंकई देश ऐसे हैं जहां आज भी धर्म- परंपरा के नाम पर अत्याचार हो रहा है
Muslim Women Circumcision: लंबे समय से मुस्लिम महिलाओं के खतना प्रथा पर दुनिया भर में बहस चल रही है. इस्लाम में आमतौर पर पुरुषों का खतना किया जाता है, लेकिन कुछ देशों में महिलाओं का खतना करने की भी परंपरा है. लेकिन अब यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के लिए खौफनाक होती जा रही है. भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में ऐसी कई महिलाएं सामने आ रही हैं जो ना केवल इस प्रथा के कारण झेल चुकी दर्द को बयां कर रही हैं, बल्कि इसका विरोध भी कर रही हैं. अंग्रेजी में इसे ‘फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन’ (FGM) कहा जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूढ़िवादी मुस्लिमों में खतना के बाद महिलाओं को ‘शुद्ध’ या ‘शादी के लिए तैयार’ माना जाता है.
पिछले दिनों अल जजीरा ने अपनी एक रिपोर्ट में पाकिस्तान में दो दशक पहले के एक वाकये का जिक्र किया है. उसके अनुसार तब सात साल की एक मासूम बच्ची का उसकी चाची ने जबर्दस्ती खतना कर दिया था. इस काम में इस बच्ची की मां की रजामंदी भी शामिल थी. लेकिन वो बच्ची जो अब लगभग 27 साल की महिला है, उस घटना को भूली नहीं है. मरियम नाम की इस महिला का भरोसा उसने चकनाचूर किया था जिस पर वह सबसे अधिक भरोसी करती थी. वह थी उसकी मां. मरियम के शरीर पर उस खौफनाक दिन के निशान अभी भी मौजूद हैं.
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महिलाओं का खतना कितना खतरनाक
महिलाओं के खतने में उनके क्लिटरस को काट कर निकाल दिया जाता है. डॉक्टरों का कहना है कि खतना से महिलाओं में प्रजनन संबंधी जटिलताएं हो सकती हैं. मानव शरीर के किसी भी अंग की तुलना में क्लिटरस में सबसे अधिक तंत्रिका अंत होते हैं और यह महिला शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है. जब इसे निकाल दिया जाता है तो तंत्रिका तंत्र कट जाते हैं. इससे संवेदना खत्म हो जाती है. महिलाओं के जननांगों को जानबूझकर काटने की परंपरा को आम बोलचाल की भाषा में महिलाओं का खतना कहा जाता है. डब्लूएचओ के अनुसार जो भी प्रक्रिया बिना किसी चिकित्सकीय कारणों के महिलाओं के गुप्तांगों को नुकसान पहुंचाए और उसमें बदलाव करे, उसे एफजीएम की ही श्रेणी में डाला जाता है. बहुत से लोगों का दावा है कि इस प्रथा से सेहत को लाभ होता है, लेकिन ये पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद तथ्य है.
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कितने देशों में है यह कुप्रथा
लेकिन दुनियाभर में कई देश ऐसे हैं जहां आज भी महिलाओं पर धर्म और परंपरा के नाम पर अत्याचार हो रहा है. महिलाओं का खतना भी उन्हीं में से एक है. डाउन टू अर्थ वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार ये कुप्रथा 92 से ज्यादा देशों में जारी है. इन देशों में 51 में इस प्रथा को कानूनी तौर पर बैन कर दिया गया है जिसमें भारत भी शामिल है. प्रतिबंध के बावजूद कई देश ऐसे हैं जहां पर परंपरा के नाम पर आज भी महिलाओं का खतना आम बात है. अफ्रीकी देशों में ये परंपरा आम है. अफ्रीकी महाद्वीप में कई देश ऐसे हैं जहां लगभग सभी महिलाओं को खतना कराना पड़ता है. इन देशों में सोमालिया, जिबूती और गिनी मुख्य हैं. मिस्र ने साल 2008 में महिलाओं का खतना प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन आज भी वहां इस तरह के मामले दुनिया में सबसे ज्यादा हैं.
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विकसित देशों में भी है ये कुप्रथा
इसके अलावा यमन, इराक, मालदीव और इंडोनेशिया में महिलाओं का खतना सबसे ज्यादा चलन में है. लेकिन यह परंपरा एशिया, मध्य पूर्व, लैटिन अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका के कई विकसित देशों में आज भी जारी है. साल 2020 में यूनिसेफ ने आंकड़े जारी किए जिनके अनुसार दुनियाभर में करीब 20 करोड़ बच्चियों और महिलाओं के जननांगों को नुकसान पहुंचाया गया है.
कब किया जाता है खतना
लड़कियों का खतना शिशु अवस्था से लेकर 15 साल तक की उम्र के बीच किया जाता है. आम तौर पर परिवार की महिलाएं ही इस काम को अंजाम देती हैं. खतना करना या कराना लड़कियों और महिलाओं में न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक नुकसान भी पहुंचाती है. खतना के कारण महिलाओं को रक्तस्राव, बुखार, संक्रमण और मानसिक आघात जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कुछ मामलों में तो उनकी मौत भी हो जाती है.
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दाऊदी बोहरा में आम बात
बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बोहरा समुदाय के मुस्लिमों में महिलाओं का खतना किया जाता है. मरियम भी पाकिस्तान के दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखती हैं. यह शिया मुसलमानों का एक संप्रदाय है, जो ज्यादातर गुजरात में बसे हुए हैं. इनके बीच खतना एक आम प्रथा है. एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तान में 75 -85 प्रतिशत दाऊदी बोहरा महिलाएं खतना करवाती हैं. पाकिस्तान में दाऊदी बोहरा मुस्लिमों की अनुमानित आबादी करीब एक लाख लोगों की है. दाऊदी बोहरा महिलाएं या तो अपने घरों में बड़ी-बूढ़ियों द्वारा बिना किसी एनेस्थीसिया और बिना स्टरलाइज किए औजारों से खतना करवाती हैं. ऐसी महिलाओं की संख्या कम ही है जो कराची जैसे शहरों में प्रोफेशनल डॉक्टर द्वारा इस प्रक्रिया को पूरा करवाती हैं.
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यूएन बता चुका मानवाधिकारों का उल्लंघन
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) इस कुप्रथा को ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ करार दे चुका है. इसे रोकने और इस बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 6 फरवरी को ‘इंटरनेशनल डे ऑफ जोरो टॉलरेंस फॉर एफजीएम’ मनाया जाता है. दुनिया के कई देश इसका विरोध करते हैं और दुनिया भर के नेताओं ने इसे 2030 तक पूरी तरह खत्म करने का वादा किया है. लेकिन हकीकत यह है कि काफी देशों में बड़ी संख्या में बच्चियों और लड़कियों को इस दर्द से गुजरना पड़ता है.
Tags: Muslim Girls, Muslim religion, Muslim Woman
FIRST PUBLISHED : January 4, 2025, 15:03 IST
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