Distribution of election tickets and rising rebellious voices in parties | भास्कर ओपिनियन: चुनावी टिकटों का बँटवारा और पार्टियों में उठते बग़ावती सुर

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39 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

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देश में राजनीतिक दलों की विडम्बना यह है कि जैसे ही वे बड़े, बहुत बड़े होते हैं, कांग्रेस हो जाते हैं। पहले चुनावी टिकटें बंटते ही कांग्रेस में भूचाल आ जाता था। टिकट चाहने वाले तो हर क्षेत्र में कई होते हैं। जिन्हें टिकट नहीं मिलता वे बग़ावत के लिए ताल ठोकते फिरते थे। बाद में कुछ टिकट बदल दिए जाते थे और कुछ को बाक़ी प्रलोभन देकर या समझा-बुझाकर मनाने में पार्टी की बड़ी ऊर्जा खर्च होती थी।

भाजपा में पहले ऐसा कुछ नहीं होता था। मिल-बैठकर टिकट तय किए जाते थे और जिसे टिकट मिलता, उसके पक्ष में प्रचार शुरू कर दिया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब भाजपा बड़ी, बहुत बड़ी हो चुकी है। वहाँ भी टिकट बँटवारे के बाद या प्रत्याशियों की घोषणा के बाद बड़ी मात्रा में बग़ावती सुर उभरने लगे हैं। राजस्थान के उपचुनाव हों, महाराष्ट्र चुनाव हों या झारखण्ड, हर तरफ़ टिकट के प्यासे भाजपाई अपनी आवाज़ उठा रहे हैं। पार्टी हमेशा की तरह अब नाराज़ लोगों को मनाने में जुटी हुई है। वे मान भी जाएँगे। लेकिन बाक़ी पार्टियाँ इन बग़ावती सुरों का आनंद ले रही हैं।

राजस्थान के उपचुनाव हों, महाराष्ट्र चुनाव हों या झारखण्ड, भाजपा अब नाराज़ लोगों को मनाने में जुटी हुई है।

राजस्थान के उपचुनाव हों, महाराष्ट्र चुनाव हों या झारखण्ड, भाजपा अब नाराज़ लोगों को मनाने में जुटी हुई है।

कारण ये है कि ज़्यादातर जगहों पर कांग्रेस के प्रत्याशी कम ही घोषित हुए हैं। जब कांग्रेस के सारे प्रत्याशी सामने आ जाएँगे तब बग़ावत का आलम कुछ और ही होगा। हो सकता है कांग्रेस की बग़ावती आँधी के बाद भाजपा के बग़ावती सुर शांत हो जाएँ क्योंकि यह मैनेजमेंट भाजपा को बखूबी आता है। कांग्रेस को भी आता होगा, लेकिन उसकी निर्णय क्षमता उतनी परिपक्व या ये कहें कि त्वरित नहीं होती। हरियाणा चुनाव के दौरान यह सबने अच्छी तरह अनुभव कर लिया है। जीता हुआ चुनाव किस तरह हारा जाता है, यह कांग्रेस ने हरियाणा में सबको बता दिया।

बगावती सुरों को शांत करना कांग्रेस को भी आता होगा, लेकिन उसकी निर्णय क्षमता भाजपा जितनी परिपक्व या ये कहें कि त्वरित नहीं होती।

बगावती सुरों को शांत करना कांग्रेस को भी आता होगा, लेकिन उसकी निर्णय क्षमता भाजपा जितनी परिपक्व या ये कहें कि त्वरित नहीं होती।

अब हरियाणा चुनाव परिणामों की समीक्षा करते हुए राहुल गांधी कह रहे हैं कि पार्टी नेताओं ने अपने हितों को पार्टी से ऊपर रखा। लेकिन सवाल यह है कि स्थानीय नेता जब ऐसा कर रहे थे तब पार्टी आलाकमान क्या कर रहा था? आप क्या कर रहे थे? स्थिति को तुरंत संभाला क्यों नहीं गया? जो पार्टियाँ इंडिया गठबंधन में थीं, उनसे चुनाव पूर्व गठबंधन क्यों नहीं किया गया। अगर यह होता तो कम से कम हज़ार-पंद्रह सौ वोटों से आप जहां हारे, वे सीटें तो आपके खाते में आ ही सकती थीं। अब महाराष्ट्र और झारखंड में ऐसी ग़लतियाँ नहीं दोहराई जाएंगी, इसकी क्या गारंटी है?

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