[ad_1]
नई दिल्ली1 घंटे पहले
- कॉपी लिंक
मिड एयर रिफ्यूलिंग के मामले में जर्मन टेक्नोलॉजी काफी एडवांस्ड मानी जाती है। जर्मनी ये एयरक्राफ्ट भारत को देने के लिए तैयार है। (फाइल)
जर्मनी सरकार अब भारत के साथ डिफेंस सेक्टर में रिश्ते में मजबूत करना चाहती है। भारत में जर्मनी के एंबैसडर फिलिप एकरमैन ने माना है कि पहले भारत के साथ डिफेंस रिलेशन्स को लेकर जर्मनी में हिचकिचाहट थी, अब ऐसा नहीं है।
एकरमैन के मुताबिक- जर्मनी अब नाटो के अलावा भी अपने डिफेंस रिलेशन मजबूत करना चाहता है। भारत और जर्मनी की सेनाएं इसी साल अक्टूबर में जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज भी करेंगी।

30 जनवरी को जर्मन एंबैसडर राजघाट गए थे। यहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए थे।
चीना आंखें दिखाता है
- ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए इंटरव्यू में एकरमैन ने दोनों देशों की रक्षा जरूरतों और साउथ चाइना सी को लेकर अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा- अब हम भारत के साथ डिफेंस और स्ट्रैटेजिक अलायंस करना चाहते हैं। इसमें हथियार बिक्री और एडवांस्ड हार्डवेयर्स का जॉइंट प्रोडक्शन शामिल है। इसमें सबमरीन भी शामिल हैं। इसका मकसद हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता दबदबा है।
- एक सवाल के जवाब में जर्मन एंबैसडर ने कहा- ये सही है कि शुरुआत में भारत के साथ डिफेंस कोऑपरेशन को लेकर जर्मनी हिचकिचा रहा था। लेकिन, अब वहां जर्मनी में भारत को लेकर साफ सियासी सोच है। इसके लिए दोनों देशों के मिलिट्री अफसर मिलेंगे। जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज होंगी, जॉइंट वेपन प्रोग्राम शुरू होंगे और सायबर वॉरफेयर को लेकर काम किया जाएगा।

जर्मन एंबैसडर ने साफ कहा है कि हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में चीन खतरनाक हालात पैदा कर रहा है और उसे रोकना जरूरी है। (फाइल)
बदलाव की वजह दुनिया के हालात
- जर्मनी के रुख में इस बड़े बदलाव की वजह दुनिया में सुरक्षा के बदलते हालात हैं। रूस और यूक्रेन की जंग भी बड़ी वजह है। हालांकि, चीन के विस्तारवादी रवैये ने यूरोपीय देशों की परेशानी ज्यादा बढ़ाई है। हिंद महासागर में वो अंतरराष्ट्रीय नियम तोड़ रहा है।
- एकरमैन कहते हैं- अब हम नाटो के इतर अपने रक्षा सहयोगी बनाना चाहते हैं। भारत इस क्षेत्र की बड़ी ताकत है। लिहाजा, उसके साथ सहयोग बढ़ाया जाएगा। कई मसले ऐसे हैं, जिनमें दोनों देश मिलकर काम कर सकते हैं। अगर सहयोगी हों, तो आप कभी अकेले नहीं होते। इंडो-पैसेफिक में बेरोकटोक ट्रैवल के लिए जरूरी है कि हम वहां ताकतवर रहें। साउथ चाइना सी और इंडो पैसेफिक में एक देश (चीन) आंखें दिखा रहा है। इस बारे में सिर्फ जर्मनी ही नहीं, दुनिया के बाकी देश भी फिक्रमंद हैं।
- हिंद महासागर में इस वक्त जर्मनी के 32 एयरक्राफ्ट तैनात हैं। इनमें से 8 यूरोफाइटर और 12 टॉर्नेडो जेट्स हैं। इसके अलावा एयरबस 300 भी यहां मौजूद है। मिलिट्री ट्रांसपोर्ट के लिए एयरबस 400 एम भी है। 15 फ्रेंच और स्पैनिश एयरक्राफ्ट भी हिंद महासागर में तैनात हैं। ये सभी अगस्त में होने वाले तरंग शक्ति (पहला चरण) अभ्यास में हिस्सा लेंगे। इसके बाद भारत-जर्मनी की नेवी अक्टूबर में गोवा में एक्सरसाइज करेंगी।
- एकरमैन ने कहा- एक जैसी सोच रखने वाले देशों के साथ हम इस रीजन में एक्सरसाइज करेंगे। इनमें अमेरिका, जापान, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। हमने इन देशों से यह वादा किया है कि इस क्षेत्र में हम एक्टिव मिलिट्री रोल प्ले करेंगे, भारत के साथ जॉइंट एक्सरसाइज करेंगे।

जर्मनी भारत को अपना मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट A400M देना चाहता है। ये अगस्त में होने वाली मिलिट्री ड्रिल में भी शामिल होने वाला है। (फाइल)
डिफेंस प्रोडक्शन में क्या खास
- इंडियन नेवी 6 एडवांस्ड स्टील्थ इलेक्ट्रिक सबमरीन हासिल करना चाहती है। करीब 42 हजार करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट किसी दूसरे देश की मदद से पूरा किया जाना है। जर्मनी इसमें रुचि दिखा रहा है।
- जून 2023 में जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिटोरियस भारत यात्रा पर आए थे और इस प्रोजेक्ट के बारे में एमओयू साइन किया गया था। जर्मनी के अलावा स्पेन की एक कंपनी भी यह कॉन्ट्रैक्ट हासिल करना चाहती है। इस प्रोजेक्ट को ‘प्रोजेक्ट 75 इंडिया’ नाम दिया गया है।
- इस बारे में एकरमैन ने कहा- सिलेक्शन प्रोसेस चल रहा है। फैसला भारत को करना है। हम उनकी मदद के लिए तैयार हैं। 10 दिन के अंदर इंडियन नेवी के अफसरों की टीम जर्मनी आ रही है। वो वहां हमारी बोट्स देखेंगी और बाकी जानकारियां हासिल करेगी। हम भारत को A400M ट्रांसपोर्ट और A330 MRTT मिड एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट भी देना चाहते हैं। छोटे हथियार भी देने को तैयार हैं।
- जर्मन एंबैसडर ने आखिर में कहा- रक्षा मामले में सहयोग के लिए दोनों देशों को बातचीत के जरिए उन क्षेत्रों की खोज करनी होगी, जहां दोनों देश मिलकर काम कर सकते हैं। यही काम भारत इस वक्त अमेरिका और फ्रांस के साथ कर रहा है। तो फिर जर्मनी क्यों नहीं? यही सवाल बड़ा है। बहरहाल, अब शुरुआत हो चुकी है।
[ad_2]
Source link
