Navabharat Exclusive Interview | जब तक जीवित हूं काम करता रहूंगा: श्याम बेनेगल

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आकाश जायसवाल@नवभारत
मुंबई: 8 बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित, पद्मश्री एवं पद्मभूषण फिल्मकार श्याम बेनेगल (Shyam Benegal) 88 साल की उम्र में भी बेहद सक्रिय हैं और भारतीय सिनेमा की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं। बेनेगल की फिल्में समाज की प्रतिबिंब है और सामने इंसान के जीवन संघर्षों को दर्शाती हैं। हाल ही में उनकी फिल्म ‘मुजीबुर: द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ रिलीज हुई जोकि बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की एक बायोपिक फिल्म है। उम्र के इस पड़ाव में जहां वें अपनी खराब किडनी के चलते डायलिसिस पर हैं वहीं काम के प्रति उनका जज्बा टस से मस नहीं हुआ। अपनी व्यस्तता से समय निकालकर मशहूर फिल्मकार ने नवभारत (Navabharat) को दिए विशेष साक्षात्कार (Exclusive Interview) में अपनी इस फिल्म और अन्य विषयों पर खुलकर बातचीत की। पेश है इसके कुछ अंश…

इस फिल्म पर काम किस प्रकार शुरू हुआ और इसे बनाने का ख्याल कैसे आया?
जैसा कि आप जानते होंगे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच एक ट्रीटी (समझौता) है जिसमें एक विषय है कि दोनों ही देश मिलकर एक फिल्म बनाएंगे। पीएम मोदी ने शेख हसीना के आगे प्रस्ताव रखते हुए कहा कि उनके पिताजी (शेख मुजीबुर रहमान) जिन्होंने बांग्लादेश की स्थापना की है। उनपर एक फिल्म बनाना चाहते हैं। ये दोनों देशों के बीच हुए समझौते का हिस्सा है। पीएम मोदी के प्रस्ताव पर शेख हसीना ने कहा कि अगर आप फिल्म बनाना चाहते हैं तो हम इसे मिलकर बनाएंगे। उन्होंने आग्रह किया कि फिल्म के निर्माण से पहले वें स्क्रिप्ट पढ़ना चाहेंगी क्योंकि ये कहानी उनके पिता की है। वे चाहती थी कि फिल्म ऐसी बने जिसमें उन्हें केवल बांग्लादेश के संस्थापक के रूप में नहीं बल्कि एक फैमिली मैन के रूप में दिखाया जाए। 

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इस फिल्म को बनाते समय आपको कि चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जब आप एक बायोग्राफिकल फिल्म बनाते हैं तो आपको यकीनन कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उस कहानी का हर किसी का अपना वर्जन है। फिल्म की कहानी से जुड़े कई असल पात्र अभी भी जीवित हैं और उन्हें वो समय अपनी-अपनी तरह से याद है। जैसे मेजर जनरल उस्मानी जिन्होंने पहले बांग्लादेशी आर्मी जनरल का पदभार संभाला था वें आज भी जीवित हैं और फिल्म पर रिसर्च करते समय हम उनसे भी मिले थे। उस समय के असल चश्मदीद लोगों से मिलने के चलते हमारा रिसर्च और मजबूत हो गया। मैं शेख हसीना से भी मिला जिन्होंने कहानी से जुड़ी कई अहम बातें समझाई। 

आपने कहा था कि अब फिल्में बनाते समय आपको निवेशक पाने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
ये समस्या हमेशा से रही है। मेरी सभी फिल्में हमेशा उस तरह से सफल नहीं हुई होंगी जिसके चलते मुझे अपनी अगली फिल्म के लिए फंडिंग मिल जाए। कारण ये है कि मेरी फिल्में बॉक्स ऑफिस हिट्स नहीं थे। लोग उन्हें पसंद करते थे, समीक्षकों द्वारा भी सराही जाती थी और उन्हें पुरस्कार भी मिलते थे। हालांकि मेरी फिल्मों ने कभी पैसे नहीं डुबाए लेकिन उन्होंने इतने पैसे भी नहीं कमाए जैसे किसी बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्में कमाते हैं। मेरी किसी फिल्म ने इतना पैसा नहीं कमाया जितना शाहरुख खान की फिल्में कमाती हैं। मेरी फिल्में अलग किस्म की रही हैं। और इसकी ऑडियंस भी अलग है। मेरी फिल्में मास ऑडियंस के लिए कम और मिडिल क्लास लोगों के लिए होती हैं। मेरी फिल्म को उतने ऑडियंस नहीं मिलेंगे जो एक शाहरुख खान की फिल्म को मिलते हैं। कॉम्प्रोमाइज शब्द क्या होता है मुझे पता ही नहीं और मैंने कभी भी अपनी फिल्म या उसकी कहानी के साथ समझौता नहीं किया। अगर आपकी कहानी इतनी दिलचस्प है तो आपको उसमें मसाला डालने की जरुरत नहीं। 

आजकल काफी मसाला फिल्मों का निर्माण हो रहा है और वें पसंद भी की जा रही हैं. इसपर आपकी क्या राय है?
ये तो हमेशा से रहा है। जो लोग फिल्म में पैसा लगते हैं वें उसे केवल एक बिजनस के रूप में देखते हैं और अगर आप उसे केवल व्यापार के रूप में देखेंगे तो उसकी अपनी डिमांड होगी कि उसे किसी भी हाल में बंपर प्रॉफिट करना होगा और छुटपुट इनकम से काम नहीं चलेगा। फिल्म बिजनस में या तो आप बंपर कलेक्शन करते हैं या तो आप हार जाते हैं। लेकिन आप अगर कम्पटीशन से हटकर सोचे तो आप समझेंगे कि आपको फिल्म की गुणवत्ता का ख्याल करना चाहिए। खास करके जब आप एक बायोग्राफिकल फिल्म बनाते हैं तो आप पर एक जिम्मेदारी होती है कि आप इतिहास से जुड़ी किसी चीज को सही रूप में दिखाए और तत्थों के साथ छेड़छाड़ न करे। 

88 की उम्र में भी आप लगातार काम कर रहे हैं। वो क्या चीज है जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है?
मेरे जिंदगी में काम के सिवा और उसमें भी फिल्मों के अलावा कुछ भी नहीं। मैं फिल्मों पर काम करना पसंद करता हूं क्योंकि इस पेशे को मैंने स्वयं चुना है और कोई मुझे फिल्म बनाने के लिए जबरदस्ती नहीं कर रहा। मैं अपनी इच्छा से फिल्में बना रहा हूं। जब तक मैं काम कर सकता हूं और जीवित हूं, मैं काम करता रहूंगा। मैं खुद को ही अपना बॉस मानता हूं। 



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