क्यों खास है ईरान की ये मस्जिद? 5 साल बाद नमाज अदा करने आए खामेनेई, आखिरी बार अमेरिका ने दिया था गहरा जख्म

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने लगभग पांच वर्षों के बाद शुक्रवार को अपनी पहली नमाज (खुतबा) के लिए ऐतिहासिक इमाम खुमैनी मस्जिद को चुना। इस दौरान उन्होंने इजरायल के खिलाफ भाषण दिया और तेल अवीव पर किए गए ईरानी हमलों का बचाव किया। लेकिन खामेनेई द्वारा इस ऐतिहासिक मस्जिद से उपदेश देना अपने आप में खास बताया जा रहा है। यह स्थान 1979 की इस्लामी क्रांति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है। खामेनेई शुक्रवार की नमाज में पिछली बार, रिवोल्यूशनरी गार्ड जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद उपस्थित हुए थे। सुलेमानी 2020 में बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था।

इमाम खुमैनी मस्जिद का ऐतिहासिक महत्व

इमाम खुमैनी मस्जिद को पहले शाह मस्जिद के नाम से जाना जाता था। यह ईरान के सबसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्णअजूबों में से एक है। यह मस्जिद तेहरान के मध्य में स्थित है और कजार युग के दौरान 18वीं शताब्दी में फतह अली शाह काजार के शासनकाल में बनाई गई थी। इस मस्जिद का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह केवल वास्तुकला का नमूना नहीं है, बल्कि इसके चारों ओर फैला तेहरान का ग्रांड बाजार क्रांति के समय एक प्रतिरोध का प्रतीक और विरोधी आवाजों का केंद्र था।

1979 की इस्लामी क्रांति में मस्जिद की भूमिका

इस मस्जिद का क्रांति में अहम योगदान रहा है। यह जगह 1979 में शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटाने और अयातुल्लाह रुहुल्लाह खामेनेई के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य की स्थापना की प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरी। इससे पहले, 1963 में शाह ने ‘व्हाइट रेवोल्यूशन’ की शुरुआत की, जिसमें महिला अधिकारों को शामिल करने वाले कई सुधार किए गए थे। हालांकि ये सुधार देश के कुछ हिस्सों में सराहे गए, लेकिन कई इस्लामी नेताओं ने इसे ईरान के “पश्चिमीकरण” के रूप में देखा और इसका विरोध किया। इन विरोधों का नेतृत्व शिया धर्मगुरु रूहोल्लाह खुमैनी ने किया, जो बाद में अयातुल्लाह अली खामेनेई के साथ मिलकर शाह के शासन के खिलाफ खड़े हुए।

1964 में खुमैनी को निर्वासित कर इराक भेज दिया गया, लेकिन उनकी क्रांतिकारी गतिविधियायां ईरान में जारी रहीं। इसी बीच, खामेनेई को भी शाह के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण कई बार जेल में डाला गया। शाह के शासन के दौरान देश में सामाजिक अशांति और आर्थिक असंतोष बढ़ता गया, और इमाम खुमैनी मस्जिद ने इन असंतुष्टों को संगठित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

विरोध के केंद्र के रूप में मस्जिद की भूमिका

इस मस्जिद के खुतबों में धार्मिक शिक्षाओं के साथ-साथ शाह के शासन की राजनीतिक आलोचनाएं भी शामिल होती थीं। ये खुतबे समाज के बड़े हिस्से में गूंजते थे और जनता में जागरूकता और प्रतिरोध की भावना जगाते थे। निर्वासन में रह रहे खुमैनी के संदेशों को भी इस मस्जिद के माध्यम से देश में फैलाया गया, जिससे सरकार के दबावों के बावजूद उनके समर्थकों में एकजुटता बनी रही।

मस्जिद ने विभिन्न विपक्षी समूहों के लिए एक समन्वय केंद्र के रूप में कार्य किया, जिससे इस्लामी राष्ट्रवाद के बैनर तले विभिन्न धड़ों को एकजुट करने में मदद मिली। इसके बाद, 1979 में शाह को सत्ता से हटा दिया गया और इस्लामी गणराज्य की स्थापना के बाद इस मस्जिद का नाम इमाम खुमैनी मस्जिद रख दिया गया।

खामेनेई का मस्जिद में प्रवचन देने का प्रतीकात्मक महत्व

अयातुल्लाह अली खामेनेई द्वारा लगभग पांच वर्षों के बाद इस मस्जिद में प्रवचन देने के लिए चुना जाना महज एक धार्मिक या राजनीतिक संदेश नहीं है, बल्कि इसका एक गहरा ऐतिहासिक संदर्भ भी है। जिस मस्जिद ने इस्लामी क्रांति के समय शाह के विरोध में जनसमूह को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उसी मस्जिद से खामेनेई ने इजरायल के खिलाफ अपने विचार रखे, यह अपने आप में ईरान के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश है।

खामेनेई ने पांच साल में पहली बार, शुक्रवार की नमाज के दौरान नेता के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए मिसाइल हमले को ईरान के सशस्त्र बलों का एक ‘‘शानदार’’ काम करार दिया। मंगलवार को ईरान ने इजरायल पर कम से कम 180 मिसाइलें दागीं, जो दोनों देशों तथा उनके सहयोगियों के बीच तेजी से बढ़ते हमलों की श्रृंखला में नवीनतम है। इसके साथ ही, पश्चिम एशिया एक क्षेत्रव्यापी युद्ध की कगार पर पहुंच गया है। इजराययल ने कहा कि उसने कई मिसाइलों को नष्ट कर दिया। वहीं, वाशिंगटन में अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी युद्ध पोतों ने इजराइल की रक्षा में सहायता की। ईरान ने कहा है कि उसकी ज्यादातर मिसाइलों ने अपने लक्ष्य को भेदा।

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