Naxalism is on the verge of extinction due to the aggressive attitude of security forces in Bastar | भास्कर ओपिनियन: बस्तर में सुरक्षा बलों के आक्रामक रवैए से नक्सलवाद ख़ात्मे की ओर

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20 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

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जम्मू- कश्मीर से आतंकवाद कब ख़त्म होगा, यह तो पता नहीं, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के लगभग ख़ात्मे की उम्मीद दिखाई देने लगी है। शुक्रवार को सुरक्षा बलों ने यहाँ तीस नक्सलियों को मार गिराया।

इसके छह महीने पहले एक मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने 29 नक्सलियों को मार गिराया था। इस एक साल में ही यहाँ पौने दो सौ नक्सली मारे गए हैं। सुरक्षा बलों की आक्रामक शैली ने बस्तर को नक्सलवाद से आज़ाद करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है। यह ज़रूरी भी था।

बस्तर में नक्सलियों द्वारा किया गया अब तक का सर्वाधिक वीभत्स नरसंहार कभी भुलाया नहीं जा सकता। वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार और नंद कुमार पटेल सहित कोई 28 कांग्रेस नेताओं की हत्या कर दी गई थी।

कहा जाता है कि इस हमले में कुछ नेताओं के तो मृत शरीर पर भी नक्सली गोलियाँ बरसाते रहे थे। चारों ओर पड़ी लाशों के बीच बंदूक़ें लहराते हुए नक्सली नाचे भी थे। पता चला था कि हमलावर नक्सलियों की संख्या कोई 1200 से भी ज़्यादा थी।

इस तरह की क्रूरता आख़िर किस तरह के वाद को पूरा करती है, यह समझ से परे है। आखिर इस तरह का वीभत्स नरसंहार करके वे क्या दिखाना चाहते थे? निश्चित ही ऐसे क्रूर लोगों का ख़ात्मा ज़रूरी है। हालाँकि बस्तर में कई वर्षों से नक्सलवाद फैल रहा है। कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन इस समस्या का कोई निदान नहीं हो सका।

अब सुरक्षा बलों ने ठान लिया है कि वे इस क्रूरता का अंत करके ही रहेंगे। भोले- भाले आदिवासियों को बहला- फुसलाकर उन पर राज करने वाले इन नक्सलियों का कोई नियम या सिद्धांत नहीं है।

व्यवस्था के खिलाफ आख़िर आप किस हद तक और कब तक जा सकते हैं? दरअसल, व्यवस्था या प्रशासन द्वारा किए जा रहे अन्याय को बंदूक़ उठाकर ठीक कैसे किया जा सकता है? फिर किसी भी तरह की नाइंसाफ़ी को दूर करने या कम करने का तरीक़ा हिंसा तो नहीं ही हो सकता।

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