China New Village Established In Demchok Looks Completely Desolate News In Hindi – Amar Ujala Hindi News Live

China new village established in Demchok looks completely desolate news in hindi

LAC पर डेमचोक गांव के अंदर पहुंचे बाइकर ने बताया चीन के कब्जे का सच
– फोटो : Amar Ujala

विस्तार


लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से सटे डेमचोक सेक्टर में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का नया गांव बसावट के लिए बिल्कुल तैयार है। चीन के इस नए गांव का नाम है शियाओकांग (मॉडल विलेज)। सलामी स्लाइसिंग रणनीति के तहत बसाए गए चीन इस नए गांव में तकरीबन 100 घर बनाए गए हैं। वहीं भारत सरकार भी चीन से चल रहे गतिरोध के बीच उसकी सलामी स्लाइसिंग रणनीति का जवाब ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ से दे रही है, जिसमें सीमा से सटे इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जा रहा है। इसी रणनीति के तहत सरकार ने एलएसी से डेमचोक गांव को भारतीय पर्यटकों के लिए खोल दिया है। हालांकि वहां सभी पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है, लेकिन कुछ बाइकर्स वहां तक पहुंचे हैं और उन्होंने अपने अनुभव अमर उजाला से साझा किए। 

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हॉट स्प्रिंग के लिए प्रसिद्ध है डेमचोक

पूर्व लद्दाख में स्थित डेमचोक सेक्टर बिल्कुल चीनी सीमा रेखा से सटा हुआ गांव हैं, जहां भारतीय सेना और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बीच अभी भी गतिरोध जारी है। 2018 में चीन ने डेमचोक सेक्टर में चारडिंग निलुंग नाला पर टेंट लगा दिए थे, ताकि इस इलाके में भारतीय सैनिकों की पहुंच को रोका जा सके। अपने हॉट स्प्रिंग के लिए प्रसिद्ध इस गांव तक पहुंचने का  पक्का रास्ता 19,024 फीट (5,799 मीटर) पर बने उमलिंग ला से हो कर जाता है, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा हाई एल्टीट्यूड मोटरेबल पास कहा जाता है। 2020 गलवान संघर्ष से पहले तक इस गांव तक पहुंचना आसान था, लेकिन चीन से गतिरोध शुरू होने के बाद यहां तक पहुंचने पर पाबंदी लगा दी गई। लेह से 305 किमी दूर डेमचोक तक कुछ बाइकर ही पहुंच पाते थे, लेकिन    वे भी केवल गांव के बाहर बनी भारतीय सेना की पोस्ट के पास बने सेना के डेमचोक कैफे से ही वापस लौट जाते थे। कुछ साल पहले तक डेमचोक को इस इलाके का आखिरी गांव ही कहा जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की पहल के बाद सीमा पर बने आखिरी गांवों को अब “पहला भारतीय गांव” कहा जाने लगा है।

सरकार पर्यटन को बढ़ाने की रणनीति पर कर रही काम

वहीं पिछले दिनों अमर उजाला ने सेना के एक वरिष्ठ अफसर से अनुरोध किया था कि डेमचोक को आम भारतीय पर्यटकों के लिए खोला जाए, ताकि वहां लोग वहां तक जाएं और विकास परियोजनाओं को स्वयं देखें और लद्दाख की यादों को अपने दिल में संजो तक लौटें। इस पहल न केवल इस क्षेत्र के लोगों की आय बढ़ेगी, बल्कि वीरान हो चुके गांवों में बसावट फिर से शुरू होगी और चीन जो अपनी जमीन होने का दावा करता है, उसे भी झुठलाया जा सकेगा और चीन भविष्य में दोबारा से ऐसा कदम उठाने के लिए हतोत्साहित होगा। उस दौरान उन्होंने जल्द ही कुछ कदम उठाने का भरोसा दिया था। वहीं, लद्दाख में तैनात सेना के वरिष्ठ सूत्रों ने बताया कि डेमचोक इलाके में चीन की गतिविधियों को लेकर सरकार काफी गंभीर हैं। सरकार वहां पर्यटन को बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। इस रणनीति के तहत डेमचोक को पर्यटकों के लिए खोला जा रहा है। ट्रायल के स्तर पर अभी कुछ बाइकर्स को डेमचोक के अंदर जाने की इजाजत दी गई है। वे चार्डिंग नाले तक जा पा रहे हैं। इस इलाके को पूरी तरह के पर्यटकों को खोलने को लेकर अभी विचार-विमर्श जारी है।   

उमलिंग ला को पार करके पहुंचे डेमचोक

वहीं हाल ही में डेमचोक गांव के अंदर तक पहुंचे बाइकर निशांत श्रीवास्तव, जिनका निशांत व्यूज नाम से एक यूट्यूब चैनल भी हैं, उन्होंने अमर उजाला को खास बातचीत में बताया कि 4,210 मीटर (13,810 फीट) की ऊंचाई पर बसे डेमचोक गांव तक पहुंचना आसान नहीं था। बीच में कई माउंटेन पास पड़ते हैं, जहां ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम होती है और उन पास (दर्रा) पर कुछ मिनट भी खड़े रह जाएं, तो जान का जोखिम बन सकता है। डेमचोक तक पहुंचने के लिए सबसे ऊंचे मोटरेबल पास उमलिंग ला को पार करना पड़ता है। उमलिंग ला से 25 किमी दूर है डेमचोक। वहां तक पहुंचने के रास्ते में उन्हें बारिश और बर्फबारी दोनों मिली। उन्होंने बताया कि वे लेह से आम परमिट के साथ अगस्त के शुरू में अपने दो साथी बाइकर्स के साथ डेमचोक पहुंचे थे। जब वे वहां पहुंचे थे, तो डेमचोक के एंट्री पॉइंट पर पहले से ही कुछ बाइकर खड़े थे। उन्होंने डेमचोक कैफे में लंच करने के बाद वापस लौटे, तो काफी बाइकर बाहर से ही वापस हो चुके थे। उन्होंने वहां चेकपोस्ट पर अंदर जाने की परमिशन मांगी, तो उन्हें इजाजत मिल गई। उनसे स्पष्ट कहा गया कि वे भारत के सैन्य प्रतिष्ठानों की कोई फोटोग्राफी न करें और उन्होंने इस नियम का पूरी तरह से पालन भी किया।

दिखाई दिया चीनी गांव और मोबाइल में चीन का नेटवर्क

निशांत बताते हैं कि जब वे डेमचोक के अंदर दाखिल हुए थे, तो वहां अंदर जाने रास्ता काफी उबड़-खाबड़ था, लेकिन अंदर कंस्ट्रक्शन का काम तेजी से चल रहा था। वहां उन्हें गांव वालों के कुछ ही मकान दिखे। वहां से कुछ दूर ही उन्हें चीन सरकार का बनाया नया गांव भी दिखा, जिस पर चीन के झंडे लगे थे। इस गांव में सभी घर एक जैसे दिख रहे थे। नए गांव के पास चीन ने ऊंची दीवार भी बना रखी है, जिसके चलते वे केवल मकानों की छतों का हिस्सा ही देख पा रहे थे। लेकिन आसपास कोई चहलपहल या गतिविधि नजर नहीं आ रही थी। चीन ने पास ही पहाड़ पर वेदर ऑब्जर्वेशन टॉवर, बंकर और वॉच टावर भी बना रखे थे, जहां से चीनी सैनिक सभी गतिविधियों पर नजर रख रहे थे। निशांत ने बताया कि जिस दिन वे डेमचोक पहुंचे थे, तो वह रविवार चार अगस्त की तारीख थी और दिन के ढाई बज (भारतीय समय) रहे थे, लेकिन जब उन्होंने अपना मोबाइल उठाया, तो उसमें पांच बजे का समय दिखा रहा है। पहले तो वह समझ नहीं पाए, लेकिन बाद में समझ आया कि मोबाइल चीनी समय दिखा रहा है। वह कहते हैं कि चीन के गांव का डेवलपमेंट देख कर वह भी हैरान रह गए। चीन ने वहां अपने मोबाइल टॉवर भी लगा रखे थे, उनके फोन में सिग्नल उसी टावर से आ रहे थे। उन्होंने हॉट स्प्रिंग खोजने की कोशिश की, लेकिन वह उन्हें नहीं दिखाई दिए। वे चार्डिंग नाले तक भी गए, जिसके उस पार का पूरा इलाका चीन का है। निशांत कहते हैं कि उन्होंने सोचा नहीं था कि वे चीन-तिब्बत सीमा के इतने नजदीक होंगे। एलएसी वहां से कुछ ही दूरी पर थी। डेमचोक में ही उन्हें एक होम स्टे भी दिखाई दिया। कुछ समय डेमचोक में रहने के बाद ने न्योमा के लिए रवाना हो गए। 

2018 में चीन ने डेमचोक में गाड़ दिए थे टेंट

चीन के नए गांव शियाओकांग में लगभग 100 नए मकान बनाए गए हैं। यह गांव पूर्वी लद्दाख में एलएसी से लगभग 10 मील की दूरी पर स्थित हैं। सूत्रों का कहना है कि इस गांव का इस्तेमाल चरवाहों के रहने के लिए किया जा सकता है। चरवाहों के नेटवर्क के जरिए चीन को सीमा निगरानी और पेट्रोलिंग में मदद मिलती है। हालांकि यह गांव चीनी क्षेत्र में है, लेकिन एलएसी के बेहद करीब है। 2018 में चीन ने डेमचोक के चार्डिंग निलुंग नाला में टेंट लगा दिए थे, ताकि इलाके में भारतीय सैनिकों की पहुंच को रोका जा सके। वहीं गलवान में हुई हिंसा के बाद भारत और चीन में गतिरोध पैदा हो गया था।

  

डेमचोक में सबसे ऊंची सड़क बना रहा भारत

भारत भी डेमचोक इलाके में सबसे ऊंची मोटरेबल रोड बना रहा है। हानले के निकट बनने वाली लिकारू-मिग ला-फुक्चे सड़क 64 किलोमीटर लंबी होगी, जिसकी ऊंचाई 19,400 फीट होगी। इसके पूरा होने के बाद यह दुनिया की सबसे ऊंची मोटरेबल सड़क बन जाएगी। दुनिया की सबसे ऊंची मोटर योग्य सड़क का वर्तमान रिकॉर्ड लद्दाख में 19,024 फीट की ऊंचाई पर स्थित उमलिंग ला रोड का है, जिसे बीआरओ ने ही बनाया है। 52 किलोमीटर लंबी यह सड़क चिशुमले को डेमचोक से जोड़ती है, जो एलएसी पर स्थित है। वहीं लिकारू को फुक्चे से जोड़ने वाली यह सड़क पूर्वी लद्दाख में एलएसी से मात्र तीन किलोमीटर दूर है। इसके अलावा पूर्वी लद्दाख के डेमचोक में बुद्ध की मूर्ति लगाने की भी तैयारी कर रहा है। भारत इससे पहले एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित कर चुका है। लुकुंग पैंगोंग त्सो के उत्तर-पश्चिमी किनारे ‘फिंगर 4’ के पास है, जबकि चुशुल में मूर्ति स्पैंगगुर गैप के सामने है, जो दोनों सेनाओं का सीमा मीटिंग प्वॉइंट है। मोल्डो में चीनी गैरिसन वहां से लगभग 8 किमी दूर है।

डेपसांग-डेमचोक पर अभी कोई बात नहीं

वहीं, 25 जुलाई लाओस की राजधानी वीएनतियान में विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई थी। जिसमें सीमा पर जारी तनाव को जल्द खत्म करने के साथ ही द्विपक्षीय संबंधों के दूसरे पहलुओं पर बात हुई। इसके पहले चार जुलाई को अस्ताना में शंघाई सहयोग संगठन के दौरान भी जयशंकर और वांग यी के बीच बैठक हुई थी। हाल ही में चीन-भारत सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय (WMCC) के लिए 30वीं और 31वीं बैठक क्रमशः नई दिल्ली और बीजिंग में 31 जुलाई और 29 अगस्त को आयोजित की गई थी। इस दौरान दोनों पक्षों ने मतभेदों को और कम किए जाने और आम सहमति बढ़ाने पर जोर दिया। 

बता दें कि पूर्वी लद्दाख में विवादित सीमा पर कम से कम दो बिंदुओं पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच गतिरोध जारी है। भारतीय इलाके के लगभग 18 किमी अंदर डेपसांग के पूर्व में ‘बॉटलनेक’ या ‘वाई-जंक्शन’ में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारतीय सैनिकों को उनके पेट्रोलिंग पॉइंट्स 10, 11, 11अल्फा, 12 और 13 पर जाने से रोक हुआ है। वहीं डेमचोक में भी टकराव जारी है। इससे पहले चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने डेमचोक में सीएनएन जंक्शन पर सैडल पास के नजदीक एलएसी के भीतर चरवाहों की मौजूदगी पर आपत्ति जता चुके हैं।

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