सहारा की धूल में 1950-60 के परमाणु परीक्षणों के रेडियोएक्टिव अंश मिले

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Nuclear Arms In Cold War: शीत युद्ध के दरम्यान, दुनिया में ज्यादा से ज्यादा परमाणु हथियार जुटाने की होड़ लगी थी. हजारों न्यूक्लियर टेस्ट किए गए. उन बमों से निकली धूल आज भी सहारा रेगिस्तान के ऊपर बहती है.

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फ्रांस ने सहारा रेगिस्तान में किए थे परमाणु टेस्ट.

हाइलाइट्स

  • 1950-60 के परमाणु परीक्षणों की धूल सहारा रेगिस्तान में मिली.
  • रेडियोएक्टिव अंश मानव के लिए खतरनाक स्तर से कम पाए गए.
  • रिसर्च से पता चला, परमाणु परीक्षणों का असर दशकों बाद भी दिखता है.

मार्च 2022 में पश्चिमी यूरोप पर धूल का गुबार छा गया था. यह धूल भरी आंधी सहारा रेगिस्तान से उठी थी. वैज्ञानिकों को उस धूल के भीतर एक चौंकाने वाला चीज मिली. उसमें 1950 और 1960 के दशक में हुए अमेरिकी और सोवियत यूनियन (USSR) के परमाणु परीक्षणों के रेडियोएक्टिव अंश मौजूद थे. फ्रांस की Paris-Saclay University की एक रिसर्च टीम के एनालिसिस से यह खुलासा हुआ है. इस धूल में रेडियोएक्टिविटी के हल्के निशान मौजूद थे, लेकिन यह स्तर खतरनाक सीमा से काफी कम था. यह स्टडी बताती है कि परमाणु परीक्षणों का असर दशकों बाद भी हमारे वातावरण में रहता है.

कैसे हुआ यह खुलासा?

सहारा की धूल भरी आंधियां अक्सर यूरोप तक पहुंचती हैं. पहले की स्टडीज में यह पता चला था कि अल्जीरिया के रेग्गाने (Reggane) क्षेत्र से ऐसी धूल उठती है, जहां 1960 के दशक में फ्रांस ने अपने पहले परमाणु परीक्षण किए थे. मार्च 2022 की आंधी के बाद, एक सिविलियन-साइंस प्रोजेक्ट के तहत छह देशों से 110 सैंपल इकट्ठे किए गए और इनका एनालिसिस किया गया.

वैज्ञानिकों ने पाया कि धूल में जो रेडियोएक्टिव सिग्नेचर थे, वे फ्रांसीसी न्यूक्लियर टेस्ट्स से मेल नहीं खाते थे. इसके बजाय, ये सिग्नेचर वही थे, जो कोल्ड वॉर के दौरान हुए परमाणु परीक्षणों के कारण दुनिया भर में फैल गए थे. 50s और 60s में, अमेरिका और सोवियत यूनियन ने सैकड़ों न्यूक्लियर टेस्ट किए. ये टेस्ट रेगिस्तानों, महासागरों, द्वीपों और जंगलों में किए गए थे.

क्या यह रेडिएशन खतरनाक है?

रिसर्च टीम ने पाया कि इस धूल में मौजूद रेडियोएक्टिव तत्व डेंजरस लेवल से काफी नीचे थे. यह तय मानक का 0.02% ही थे. यानी आम लोगों के स्वास्थ्य को इससे कोई बड़ा खतरा नहीं है.

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